आध्यात्मिक विकास के तीन चरण…

विकास के तीन चरण है-
पहला: परिस्‍थिति मालिक है और तुम बस पीछे-पीछे घिसटते हो। तुम मानते हो कि तुम हो, लेकिन तुम हो नहीं।
दूसरा: तुम होते हो, और परिस्‍थिति तुम्‍हें घसीट नहीं सकती, परिस्‍थिति तुम्‍हें प्रभावित नहीं कर सकती। क्‍योंकि तुम एक संकल्‍प बन गए हो। तुम केंद्रित और क्रिस्टलाइजेशन हो गए हो।
तीसरा: तुम परिस्‍थिति को प्रभावित करने लगते हो—तुम्‍हारे होने मात्र से ही परिस्‍थिति बदलने लगती है।
पहली अवस्‍था अज्ञानी की है; दूसरी अवस्‍था उस व्‍यक्‍ति कि है जो सतत सजग है। लेकिन अभी है अज्ञानी ही—उसे सजग रहना पड़ता है। सजग रहने के लिए कुछ करना पड़ता है। उसका जागरण अभी स्‍वाभाविक नहीं हुआ है। इसलिए उसे संघर्ष करना पड़ता है। यदि वह एक क्षण के लिए भी होश या जागरण खोता है तो वह वस्‍तु के प्रभाव में आ जाएगा। तो उसे सतत होश रखना पड़ता है। वह साधक है, जो साधना कर रहा है।
यह स्‍मरण रखने जैसी चीज है। तुम कमजोर हो इसीलिए कोई भी चीज तुम पर हावी हो सकती हे। और शक्‍ति आती है सजगता से, होश से। जितने ज्‍यादा सजग, उतने ही शक्‍तिशाली; जितने कम सजग उतने कम शक्‍तिशाली।
देखो: जब तुम सोए होते हो तो एक सपना भी शक्‍तिशाली हो जाता है। क्‍योंकि तुम गहरी नींद में खोए हो, तुमने सारा होश खो दिया है। एक सपना भी शक्‍तिशाली हो गया। और तुम इतने कमजोर हो कि तुम उस पर संदेह नहीं कर सकते।
बेतुके से बेतुके स्‍वप्‍न में भी तुम संदेह नहीं कर सकते, तुम्‍हें उसे मानना ही होगा। और जब तक वह चलता है, तब तक वास्‍तविक लगता है। सपने में भले ही तुम बेतुकी चीजें देखो, लेकिन सपना देखते समय तुम उस पर संदेह नहीं कर सकते। तुम ऐसा नहीं कह सकते कि यह वास्‍तविक नहीं है; तुम ऐसा नहीं कह सकते कि बस एक सपना है, कि यह असंभव है। तुम ऐसा कह ही नहीं सकते हो, क्‍योंकि तुम गहरी नींद में हो।
जब होश नहीं होता तो एक सपना भी तुम्‍हें कितना प्रभावित करता है । जाग कर तुम हंसोगे और कहोगे, ‘वह सपना बेतुका था, असंभव था, ऐसा हो ही नहीं सकता। वह केवल भ्रम था।’ लेकिन जब वह चल रहा था तो यह बात तुम्‍हारे ख्‍याल में नहीं आई थी और तुम उसमें उलझे ही रहे। उससे प्रभावित हो गये। उसमें खो गये। सपना इतना शक्‍ति शाली क्‍यों था? सपना शक्‍तिशाली नहीं था, तुम शक्‍तिहीन थे।
इसे स्‍मरण रखो: जब तुम शक्‍तिहीन होते हो तो एक सपना भी शक्‍तिशाली हो जाता है। जब तुम जागे होते हो तो कोई सपना तुम पर प्रभावी नहीं हो सकता, लेकिन यथार्थ, तथाकथित यथार्थ प्रभावी हो जाता है। जागा हुआ व्‍यक्‍ति बुद्ध पुरूष इतना सजग होता है कि तुम्‍हारा यथार्थ भी उसे प्रभावित नहीं कर सकता।
ज्ञानी व्‍यक्‍ति के लिए चीजें भी है और वह भी है। लेकिन उसके और चीजों के बीच कोई सेतु नहीं है। सेतु टूट गया है। वह अकेला चलता है। अकेला जीता है। वह अपना ही अनुसरण करता है। कुछ और उसे आविष्‍ट नहीं कर सकता। इस अनुभव के कारण ही हमने इस उपलब्‍धि को मोक्ष कहा है। मुक्‍ति कहा है। वह परम मुक्‍त है।

-osho


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