इन सूत्रों को समझने पर होश बढ़ता है और होश बढ़ने पर ये सूत्र समझ आते हैं
- खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे, यहां हाथों को भरा हुआ समझना एक भूल है।
- यहां जो भी मिला हुआ है, सब बोनस है क्योंकि खाली हाथ आए थे, खाली हाथ जाएंगे।
- न अपनी मर्जी से आए थे, न अपनी मर्जी से जाएंगे ,तब काहे सब अपनी मर्जी से चलाना चाहते हो ,काहे अपनी मर्जी पूरी न होने पर दुखी होते हो।
- जीवन एक धोखा है, यहां खाली हाथ आते हैं, खाली हाथ जाते हैं, लेकिन जीवनभर हाथों के भरे होने का धोखा बना रहता है।
- सब परिवर्तन है, परिवर्तन ही परिवर्तन, परिवर्तन को परिवर्तन जानकर विसर्जित करो।
- इस अनंत अस्तित्व में मेरा अस्तित्व धूलकण जितना भी नहीं है।
- इस अनंत अस्तित्व में मेरे होने या ना होने से कोई फर्क नहीं पड़ता।
- आज का एपिसोड जारी है,और ये एपिसोड अंतिम भी हो सकता है।
- We all are loosers, we are not gaining time, we are loosing time.
- जीवन एक धोखा है,शरीर मरणधर्मा है,मन उधार है।
- I m loosing time .
- दृश्य झूठ है, क्षणभंगुर है, शाश्वत नहीं है। क्षणिक धोखा है। शाश्वत होने का धोखा देता है।
- कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा।
- This could be my last day.
- यह क्षण अटल है, मैं इस क्षण में हूं या अपने दिमाग की बकवास में।
- मन के भटकाव की चिंता छोड़ो , रसमग्नता खोजो , एकाग्रता परिणामस्वरूप आएगी।
- Enjoy bonus of life.
- All is dream stuff.
- Identification with body and mind is root cause of suffering. ( नागार्जुन-युवक-भैंस-तादात्म्य)
- असार को असार की तरह जान लेना , सार की ओर ले जाता है।
- मन को जब तक टास्क मिलते रहेंगे, तब तक शांति प्राप्त नहीं होगी। टास्क चाहे संसार को पाने का हो या सत्य को पाने का हो।
- मन को खाली कैसे करें? = मन को भरना बंद करो
- पहले सुनो, फिर सुने हुए को कसौटी पर परखो।
- अंधेरे को बाहर निकालने की बजाय होश का दिया जलाओ।
- सम्यक दृष्टि – जो जैसा है उसे वैसा ही देख लेना।
- बुद्ध श्रद्धा को थोपते नहीं बल्कि जन्माते हैं, नास्तिकता को आस्तिकता
की सीढ़ी बनाकर। - बुद्ध का प्रेम उनका स्वभाव है, जबकि हमारा प्रेम महज एक कृत्य है।
- जहां दूसरे के सुख के लिए स्वयं वस्तु बन जाने का भाव होता है, वहां प्रेम होता है। जहां अपने सुख के लिए दूसरे को वस्तु बना देने का भाव हो , वहां वासना है।
- जीवन का सबसे बड़ा झूठ यह है कि वास्तविकता ‘वास्तविक’ है।
- सफलता से बड़ी विफलता खोजना मुश्किल है। क्योंकि सफल होकर अंततः यही पता चलता है कि सफलता एक धोखा है।
- विज्ञान परिस्थिति को बदलने पर विश्वास करता है, जबकि धर्म व्यक्ति
को रुपांतरित करने की बात करता है। यही कारण है कि एक बुद्ध भिखारी होकर भी आनंदित है, जबकि एक मिडास चमत्कारी शक्तियों का मालिक होकर भी दुखी है। - धर्म की दृष्टि में केवल एक ही रूपांतरण जरूरी है, जोकि सजगता में वृद्धि करना है।
- Unoccupied mind state / no task state of mind में ही हम सम्यक दर्शन और सम्यक श्रवण में सक्षम हो पाते हैं।
- जिस दिन तुम्हें यह समझ आ जाएगा कि, तुम्हारा दुख तुम्हारा ही चुनाव है, उस दिन तुम ठीक ठीक अर्थों में अपने मालिक हो जाओगे।
- अगर तुम दुखी हो तो इसका कारण यह है कि तुम अस्तित्व के नियमों के विपरीत कुछ कर रहे हो।
- अस्तित्व के नियमों के साथ बहने पर अकारण आनंद मिलता है।
- सद्गुरु नियम की बात नहीं करता, होश की बात करता है, संभाल सको तो ठीक, न संभाल सको तो भी कोई बात नहीं। कम से कम कोई आत्मग्लानि तो नहीं होगी।
- Efficiency with awareness, is the best combination.
- Meditation is incomplete without compassion.( Compassion – other is more important than me)
- One of Buddha’s great contributions to the psychology of man: the process of the de-automatization, slowing everything down.
- मंजिल पर सभी गुरु एक हैं , मार्गों पर नहीं, इसलिए तालमेल बिठाने में समय बर्बाद करने की जरूरत नहीं है।
- जीवन को परिपूर्णता में जिओ,तब असार को असार अनुभव करके पहुंच जाओगे।
- वैराग्य और अभ्यास एक दूसरे के पूरक हैं।
- इंसान का विकास जानवर से हुआ है , इसलिए इंसान में जानवर के लक्षण होते हैं । इंसान उन लक्षणों को हमेशा दबाने की कोशिश में लगा रहता है । तनाव और द्वंद्व की स्थिति में रहता है। यही कारण है कि एक बच्चा खुश दिखाई देता है जबकि एक बूढ़ा व्यक्ति बहुत ज्यादा दुखी दिखाई पड़ता है। क्योंकि बच्चा कुछ नहीं दबाता और बूढ़े को समझदार होने का दिखावा करने के कारण बहुत कुछ दबाना पड़ता है।
- The unconscious is all the past centuries, it is carrying the whole evolution of man. It is barbarous, it is animal. Only a small part of your being has become conscious, but that small being can manage to dispel the whole unconsciousness if you don’t become a victim of it again and again.
- जो क्षणभंगुर को पकड़ना चाहता है, उसके भीतर ही विचारों का तूफान उठता है। जो क्षणभंगुर को क्षणभंगुर जान लेता है, वह क्षणभंगुर को पकड़ने की चेष्टा भी नहीं करता और इसलिए उसके विचार भी क्षीण हो जाते हैं। इस प्रकार निर्विचार चित्त की अवस्था प्राप्त होती है, जिसे ध्यान कहते हैं। यही वैराग्य का लक्ष्य है।
- बेहोशी में किया गया काम पाप है, होश में किया गया काम पुण्य है।
- Risk everything for awareness, but never risk awareness for anything. This is the commitment of a sannyasin: that he is ready to lose his life but not his awareness; he has found a value which is higher than life. There is no other value which is higher than awareness. Awareness is the seed of godliness in you.
- दो चीज़ें है-स्वीकार और सजगता। और तुम सजग तभी हो सकते हो जबकि तुम समग्रता से स्वीकार कर लो। यदि तुम मुझे स्वीकार नहीं करते तो तुम मेरे चेहरे की तरफ नहीं देख सकते। यदि तुम मुझे स्वीकार नहीं करते तो तुम मुझसे सूक्ष्म ढंग से आँख बचाओगे। यदि मैं कमरे में उपस्थित भी होऊँ, तो भी तुम किसी दूसरी तरफ देखने लगोगे, तुम किसी और चीज के बारे में सोचोगे। यदि तुम मुझे स्वीकार नहीं करते, यदि तुम मुझे नकार करते हो, तो तुम्हारा सारा मन मुझसे दूर हटेगा। यदि तुम क्रोध को मना करते हो, तो तुम उसके प्रति सजग नहीं हो सकते, तुम उसके आमने-सामने खड़े नहीं हो सकते। और जब क्रोध को आमने-सामने देखा जाता है, तो वह विलीन हो जाता है। जब काम को देखा जाता है तो ऊर्जा मुक्त हो जाती है, किसी दूसरी दिशा में। अपने मन को प्रत्यक्ष देखो और उसे स्वीकार करो।
- स्वीकार से संघर्ष खो जाता है और संघर्ष में जो शक्ति खो रही थी वह नहीं खोती। तुम अधिक शक्तिशाली हो जाते हो। इस शक्ति और सजगता से, तुम अपने मन से ऊपर चले जाते हो। इसलिए तुम्हें अपने मन का स्वीकार होना चाहिए, और मन के प्रति सजगता हो।
- Compulsiveness is like darkness – you cannot fight with it. You have to turn on the light of consciousness.
- हमारा मन अतीत और भविष्य में क्यों जाता है? बुद्ध कहते हैं कि चूँकि तुमने कुछ अनुभव किया है, इसलिए तुम उसकी पुनः कामना करते हो। चूँकि तुम कामना करते हो, तुम भविष्य में गति करते हो। कोई कामना मत करो और कोई भविष्य नहीं है। यह कठिन है क्योंकि मन जब सुख का अनुभव करता है तो वह पुनरुक्ति की कामना करता है। और जब मन दुःख का अनुभव करता है तो वह नहीं चाहता कि वह पुनरुक्त हो। वह उसे टालना चाहता है। इसी कारण यह बहुत प्राकृतिक बात है कि भविष्य निर्मित होता है। और इसी भविष्य के कारण हम वर्तमान से चूक जाते हैं।
- महावीर ने कहा है कि यदि तुम सम्यक रूप से सुन सको तो फिर कुछ और करने की आवश्यकता नहीं है। केवल श्रावक हो जाने से ही, सम्यक श्रोता हो जाने से ही तुम जो कुछ भी पाने योग्य है उसे पा लोगे। केवल श्रावक होने से ही- सम्यक सुनने वाले होने से ही-क्योंकि सुनना सिर्फ सुनना नहीं है, वह एक बड़ी घटना है। और एक बार तुम्हें रहस्य का पता चल जाये तो फिर तुम किसी भी जगह उसका उपयोग कर सकते हो। तब केवल भोजन करना भी ध्यान हो जाएगा, सिर्फ चलना भी ध्यान हो जायेगा, केवल सोना भी ध्यान हो जाएगा। तब जिस कार्य में तुम उस क्षण में होओगे; बिना भविष्य में गति किए, वही ध्यान हो जाएगा।
- जो भी तुम कर रहे हो, एक ही बात स्मरण रखो, वर्तमान मे रहो, उसे करते समय। यह बहुत कठिन है, बड़ी मुश्किल बात है, और तुम एकदम से सफल भी नहीं होओगे। एक लम्बी आदत को तोड़ना पड़ेगा। यह एक कड़ा संघर्ष है, लेकिन प्रयत्न करें। प्रयत्न करना भी अन्तराल पैदा कर देगा, और यह प्रयास ही कभी तुम्हें वर्तमान के कुछ क्षण दे देगा। और यदि तुम एक बार इसका स्वाद चख लो तो फिर तुम मार्ग पर हो।
- जब शंकर कहते हैं कि यह संसार माया है तो उनका मतलब है कि आदमी का संसार भ्रम है, न कि यह संसार। हम इस संसार के बारे में कुछ भी नहीं जानते। हमने अपने मानसिक संसार बना रखे हैं। प्रत्येक का अपना एक जगत है- अतीत और भविष्य का एक जगत स्मृतियों और कामनाओं का एक जगत, वह जगत झूठा है, भ्रम है।
- किसी भी क्षण, किसी भी कार्य में, यहीं और अभी में रहने का प्रयत्न करो। प्रयत्न भी एक बाधा है, लेकिन प्रारंभ में प्रयत्न करना पड़ेगा। शुरू में तुम्हें प्रयत्न करना ही पड़ेगा। प्रयत्न भी एक बाधा है क्योंकि हर प्रयत्न तुम्हें भविष्य में ले जाता है। लेकिन शुरू में यह करना ही पड़ेगा फिर दूसरे चरण में प्रयत्नरहित प्रयत्न करना होता है, और फिर तीसरे चरण में प्रयत्न विलीन हो जाता है और तुम वर्तमान में होते हो। तुम सड़क पर चल रहे हो, तब केवल चलो, कुछ भी और करने का प्रयत्न मत करो।
- जब सवेरे तुम्हें मालूम पडे, पहली वार कि नींद टूट गई तो एकदम से बिस्तर के बाहर कूदकर मत आ जाओ। वहीं पडे़ रहो पाँच मिनट। पुनः चादर का अनुभव करों। उष्णता का अनुभव करो, सर्दी का, छत पर पड़ रहीं वर्षा का, अथवा सड़क पर फिर से चालू हो गये ट्रैफिक की आवाज का अनुभव करो, अथवा जगत का अनुभव करो। जो कि जाग गया है-शोर, पक्षियों का गीत-इस सबको पुनः अनुभव करो। तुरन्त दिन में छलांग न लगाओ। सुबह के साथ रहो। अन्यथा तुम्हारी नींद टूट जाएगी और तुम बाहर निकलकर दौड़ पड़ोगे, भविष्य में चले जाओगे।
- बुद्ध ने कहा है-‘‘जब तुम मिट ही नहीं जाते तुम स्थिर नहीं हो सकते। तुम ही समस्या हो। तुम ही शोर हो, तुम ही गति हो। इसलिए जब तक तुम पूरी तरह मिट न जाओ, तुम पूर्ण स्थिरता को उपलब्ध नहीं हो सकते।’’ इस कारण ही बुद्ध को ‘‘अनात्मवादी’’ कहते हैं अर्थात जो किसी आत्मा में विश्वास नहीं करते।
- हम सोचते चले जाते हैं कि हम हैं-‘कि मैं हूँ।’ यह ‘मैं’ बिल्कुल ही मिथ्या है। और इस ‘मैं’ के कारण ही बहुत-सी बीमारियों का प्रारंभ होता है। इस ‘मैं’ के कारण ही तुम अतीत को इकट्ठा करते जाते हो, इस ‘मैं’ के कारण ही तुम अतीत के सुखों को पुनरूक्त करने की विचारते रहते हो। सब कुछ इस ‘मैं’ पर टिका है-अतीत, भविष्य, इच्छाएँ।
- बुद्ध ने गहरे ध्यान में जाना कि हम संसार की सारी इच्छाओं को छोड़ सकते हैं, किन्तु यदि यह ‘मैं’ रहता है तो यह मोक्ष की इच्छा करने लगता है-परम मुक्ति, परमात्मा के साथ एक होने की स्वतन्त्रता ब्रह्म के साथ एक होने की मुक्ति। यदि यह ‘मैं’ रहता है तो इच्छाएँ रहेंगी, चाहे उनकी दिशा कोई भी क्यों न हो और उनका उद्देश्य कुछ भी क्यों न हो।
- बुद्ध कहते हैं, इस ‘मैं’ केन्द्रित अस्तित्व को गिरा दो। परन्तु कैसे गिरायें इसे? कौन गिरायेगा? यदि कोई ‘मैं’ ही नहीं है तो कौन गिरायेगा? गिराने का अर्थ है कि अपने भीतर जाये और इसे खोजें-उसकोढूढ़ें कि वह कहाँ हैं, कि वह है भी या नहीं। क्योंकि जो भी भीतर गए हैं और जिन्होंने भी खोजा है, उन्हें यह नहीं मिला। केवल वे ही जो कभी भीतर नहीं गये हैं, और जिन्होंने उसे कभी नहीं खोजा हैं, वे ही विश्वास करते हैं कि वह है। कोई भी आज तक खोज कर नहीं बता पाया है कि ‘मैं’ है।
- जब मैं कहता हूँ कि मैं हूँ तो ‘‘हूँ’’ ही वास्तविकता है न कि ‘मैं’ जब तुम भीतर जाते हो, तो तुम्हें कुछ होने की प्रतीति होती है। एक विशेष अस्तित्वगत अनुभूति होती है। तुम्हें प्रतीति होती है कि कुछ है, लेकिन वह तुम नहीं हो। ‘‘मैं’’ की कोई प्रतीति नहीं होती। केवल एक विकेन्द्रित हूँ के होने की प्रतीति होती है। अस्तित्व की अनुभूति होती है बिना किसी ‘मैं’ के।
- अध्यात्म के मार्ग पर प्रवेश करने के पहले बुद्ध की सलाह सदैव स्मरण रखनी चाहिए। उन्होंने कहा है कि इसके पहले कि तुम किसी भी मार्ग में प्रवेश करो, यह देख लो कि यह ‘‘मैं’’ है भी या नहीं? केवल तभी तुम्हारा मार्ग आध्यात्मिक होगा। अन्यथा, कोई भी मार्ग हो, वह अन्ततः सांसारिक ही साबित होगा, क्योंकि यह ‘‘मैं’’ उसका पोषण करेगा।
- यह सवाल ही नहीं है कि तुम्हारे पास समय है या नहीं। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम तीन घंटे रोजाना ध्यान करो-कि तुम अपने जीवन में से तीन घंटे अलग निकाल लो, अपने काम की जिन्दगी में से-नहीं। यदि तुम निकाल सको, तो अच्छा है। यदि तुम नहीं निकाल सको, तो बहाना मत बनाओ। तब पीछे मुड़कर सिर्फ अपने कार्य को ही ध्यान में बदल लो। जो भी करो ध्यानपूर्वक करो। तुम कुछ लिख रहे हो, पूरी सजगता के साथ लिखो। तुम जमीन में कोई गढ्ढ़ा खोद रहे हो, तो होशपूर्वक खोदो। चाहे तुम सड़क पर काम कर रहे हो अथवा दफ्तर में, अथवा बाजार में, उसे पूरी सजगता से करो। सदैव वर्तमान में रहो और फिर देखो कि तुम नहीं थकोगे। तुम्हारे पास ज्यादा समय होगा, ज्यादा ऊर्जा होगी, शक्ति कम नष्ट होगी। और अन्ततः तुम्हारा जीवन एक खेल हो जाएगा।
- जब हम नहीं थे , तब भी दुनिया चल रही थी। जब हम नहीं होंगे, तब भी दुनिया चलती रहेगी। जो ऐसा जानता है, उसे किस बात की चिंता।
- The moment you remember, the miracle happens, the paradox happens: in self-remembering, self disappears; only remembering is left. In non-self-remembering, there is no remembering, but the self continues. The self and remembering cannot exist together; their co-existence is not possible.
- Automatic mode से Manual mode की तरफ मुड़ना ही मार्ग है।
- काम, क्रोध,भय,लोभ तथा मोह से निपटने के दो मार्ग – मन को समझाने का तर्क का मार्ग ( सामान्य मार्ग) , होश का मार्ग ( बुद्ध का मार्ग)
- In Zen they say: The art of meditation is almost the art of being a thief.
You have to be so aware that you can walk into somebody else’s house where you may never have been before; not only can you walk, you can remove things without making any noise; not only that, but without any light in the dark night. You have to be like a thief: very aware, very conscious. - आत्म-विस्मरण ही एकमात्र पाप है, आत्म-स्मरण ही एकमात्र पुण्य है।
- आत्म-स्मरण के साथ भोग तंत्रयोग है।
- जब मकान में आग लगती है, तो आग का दर्शन ही छलांग बन जाता है। दर्शन में और छलांग में इंचभर का फांसला नहीं होता, तत्क्षण छलांग घट जाती है।
इसलिए बुद्ध ने कहा है कि तृष्णा दिखायी पड़ जाए—दिखायी पड़ जाए कि मेरे घर में आग लगी है, तो उसी दृष्टि में, उसी दर्शन में रूपांतरण है। - सुख के क्षणों में ध्यान करें, दुख में नहीं।
- विचारों के घोड़ों पर सवार हुए बिना विचारों के घोड़ों को दौड़ते हुए देखना ही मार्ग है।
- चेतना में केंद्रित हो जाना ही मन का नियंत्रण है।
-alertyogi
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