तुम दुखी हो,
क्योंकि तुम्हारा मन दुखी है।
तुम्हारा मन दुखी है,
क्योंकि तुम्हारे मन में अनचाहे विचार चल रहे हैं।
तुम्हारे मन में अनचाहे विचार चल रहे हैं,
क्योंकि तुम्हारा अपने मन की गतियों पर नियंत्रण नहीं है।
तुम्हारा अपने मन की गतियों पर नियंत्रण नहीं है,
क्योंकि तुम्हारा शरीर की गतियों पर नियंत्रण नहीं है।
तुम्हारा शरीर की गतियों पर नियंत्रण नहीं है,
क्योंकि तुम शरीर की क्रियाएं होशपूर्वक नहीं करते हो।
तुम शरीर की क्रियाएं होशपूर्वक नहीं करते हो,
क्योंकि तुम्हें ऐसा करना जरूरी नहीं लगता।
इस प्रकार दुख का निवारण करने के लिए इसकी जड़ पर जाने से पता चलता है कि दुख की शुरुआत शरीर की क्रियाएं (उठना, बैठना, चलना, फिरना, नहाना, खाना खाना इत्यादि समस्त शारीरिक क्रियाएं) बेहोशी में करने से होती है।
इस बारे में सदगुरु ओशो बुद्ध के जीवन की एक घटना हमेशा बताते हैं-
“बुद्ध एक सुबह प्रवचन करते थे। कोई दस हजार लोग इकट्ठे थे। सामने ही बैठ कर एक भिक्षु पैर का अंगूठा हिलाता था। बुद्ध ने बोलना बंद कर दिया और उस भिक्षु को पूछा कि यह पैर का अंगूठा तुम्हारा क्यों हिल रहा है? जैसे ही बुद्ध ने यह कहा, पैर का अंगूठा हिलना बंद हो गया। उस भिक्षु ने कहा, आप भी कहां की फिजूल बातों में पड़ते हैं! आप अपनी बात जारी रखिए। बुद्ध ने कहा, नहीं; मैं यह पूछे बिना आगे नहीं बढूंगा कि तुम पैर का अंगूठा क्यों हिला रहे थे? उस भिक्षु ने कहा, मैं हिला नहीं रहा था, मुझे याद भी नहीं था, मुझे पता भी नहीं था।
तो बुद्ध ने कहा, तुम्हारा अंगूठा है, और हिलता है, और तुम्हें पता नहीं; तो तुम सोए हो या जागे हुए हो? और बुद्ध ने कहा, पैर का अंगूठा हिलता है, तुम्हें पता नहीं; मन भी हिलता होगा और तुम्हें पता नहीं होगा। विचार भी चलते होंगे और तुम्हें पता नहीं होगा। वृत्तियां भी उठती होंगी और तुम्हें पता नहीं होगा। तुम होश में हो या बेहोश हो? तुम जागे हुए हो या सोए हुए हो?”
शरीर की क्रियाएं होशपूर्वक करने से मन की क्रियाएं भी होशपूर्वक होने लगते हैं और इस प्रकार मन में अनचाहे विचार नहीं आते तथा परिणामस्वरूप दुख उत्पन्न नहीं होता।
– osho insights
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