यदि आप सजग रहते हैं, तो दो बातें घटित होंगीः कि जो ऊर्जा संलग्न होने में लगने वाली थी अथवा दमन करने में खर्च होने वाली थी, वही ऊर्जा आपकी सजगता का हिस्सा बन जाएगी। आपकी सजगता उसी ऊर्जा से और भी अधिक होगी। वह ऊर्जा आपकी जागरूकता को मिल जाएगी, और आप और भी अधिक सजग हो जाएंगे। वही ऊर्जा आपकी चेतना के लिए इृध! धन बन जाएगी। आप और अधिक सजग हो जाएंगे। और पहली बार अचेतन आपको बाध्य नहीं कर सकेगा। पहली बार अचेतन आपको चलाने में असमर्थ होगा। और जहां एक बार भी आपको इस मुक्ति का अनुभव हो गया कि अचेतन फिर आपको नहीं चला सकेगा। अब आप लड़ते भी नहीं हैं, आप कोई संघर्ष भी नहीं करते हैं, तब कोई द्वंद्व भी नहीं है-क्योंकि अब आप की चेतना और अधिक मजबूत हो गई है।
और धीरे-धीरे चेतना का क्षेत्र बड़ने लगेगा और अचेतन का क्षेत्र सिकुड़ने लगेगा। आप मनुष्य रूपी हिमशैल का एक हिस्सा और प्राप्त कर लेंगे और आप दो हिस्से चेतन होंगे वे आठ हिस्से अचेतन। यह एक लंबी यात्रा है, और धीरे-धीरे आप तीन हिस्से चेतन होंगे और सात हिस्से अचेतन। और इसी तरह क्रमशः आप शत-प्रतिशत चेतन हो जाएंगे।
जैसे-जैसे आप अधिकाधित उपलब्ध करते जाएंगे, तो यह ऐसे ही होगा जैसे कि समुद्र से जमीन को वापस प्राप्त करना। आपको एक-एक इंच जमीन लेनी होगी। परंतु जिस क्षण भी आप जमीन पर पुनः अधिकार कर लेते हैं, समुद्र पीछे खिसक जाता है। अंततः एक दिन आता है, जैसे कि बुद्ध के अथवा जीसस के जीवन में आया, अब आपके दसों हिस्से हो गए चेतन और अचेतन विलीन हो गया। आप भीतर तक प्रकाश ही प्रकाश हो जाएंगे, और कोई अंधकार नहीं होगा। यही खिलाना है, प्रस्फुटित होना है, और पहली बार आप अपने अमरत्व के प्रति बोध से भर उठेंगे। पहली बार आप एक चीज नहीं होंगे। पहली बार ऐसा होगा कि आपके लिए कुछ भी होना बाकी नहीं होगा। आपको जो होना था, आप हो गए होंगे। यदि यह कहना ठीक हो, तो आप अपने स्वरूप को प्राप्त हो गए, अपने बीइंग को उपलब्ध हो गए, आप अपने होने को पहुंच गए।
बुद्धत्व की इस स्थिति में, कोई दुख, कोई द्वंद्व, कोई संताप नहीं होगा। आप आनंद से भर गए होंगे। भीतर आप आनंद हैं, और बाहर करुणा। आप प्रत्येक चीज के प्रति संवेदनशील हो गए होंगे। इस संवेदनशीलता के कारण से ही बुद्ध बाहर करुणापूर्ण हैं। भीतर एक गहन शांत आनंद के सरोवर व बाहर मात्र करुणा। बुद्ध के होंठ एक गहरे आनंद में मुस्कुरा रहे हैं, और उनकी आंखें एक गहरी करुणा के कारण आंसुओं से भरी हुई हैं।
-osho
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