- मनुष्य जीता है और उसे होश है कि वह जीवित है, क्योंकि वह जानता है कि मृत्यु है। ~ज्ञान के साथ विपरीत का एहसास होता है और समस्याओं का आविर्भाव होता है।~हम इस ज्ञान को फेंक सकते हैं, किन्तु केवल उस चरम बिन्दु से जहाँ कि हम पूर्ण सजग हो जायें। जब यह भाव भी नहीं रहे कि मैं सजग हूँ । ~~~अपने अज्ञान में से बाहर निकलना ही होता है, यह प्रथम चरण है। और फिर अपने ज्ञान से भी बाहर निकलना होता है, वह दूसरा चरण है।
- एक छोर हमारे पास हैं कि वापस गिर जाओ। हम वह कर सकते हैं परन्तु वह असंभव है क्योंकि हम सदैव के लिए उसमें नहीं रह सकते। हमें बार-बार आगे की ओर फेंक दिया जाता है।
दूसरी संभावना यह है कि हम हमारी चेतना में बढ़ते चले जायें। एक बिन्दु ऐसा आता है कि तुम पूर्ण सजग हो जाते हो और जहां से कि तुम अतिक्रमण कर सकते हो। - स्वयं का सतत स्मरण एक सूक्ष्म शक्ति-को निर्मित करता है। एक बहुत ही सूक्ष्म ऊर्जा तुम्हारे भीतर पैदा होने लगती है। तुम घनीभूत होने लगते हो। ~ तुम्हारी शक्तियॉ सघन होने लगती हैं, संगठित होने लगती हैं भीतर एक बिन्दु पर और एक ‘स्व’ का उदय होने लगता है। स्मरण रहे, इगो का, अहंकार का नहीं, बल्कि ‘स्व’ का जन्म होगा। इगो ‘स्व’ का झूठा भाव है। बिना किसी ‘स्व’ के तुम ऐसा मानते चले जाते हो कि तुम्हारे भीतर ‘स्व’ है वही अहं का भाव है।~ अहं का अर्थ होता है एक मिथ्या स्व। तुम स्व नहीं हो, और फिर भी तुम्हें प्रतीत होता है कि तुम एक ‘स्व’ हो।~ एक खोजी को तो पता होना चाहिए कि अभी वह है ही नहीं। अन्यथा, खोज की जरूरत ही क्या है?तुम नहीं हो , यदि कोई इस बात को अनुभव कर सके, तो उसका अहंकार वाष्पीभूत हो जाता है। ~‘स्व’ का अर्थ होता है एक केन्द्र जो कि वादा-कर सके। यह केन्द्र तब निर्मित होता है जबकि कोई लगातार सजग रहे, सतत होश बनाये रखे।~ ध्यान रहे कि जब भी तुम कुछ कर रहे हो, कि तुम बैठ रहे हो, कि अब तुम सोने जा रहे हो, कि अब तुम्हें नींद आ रही है, कि तुम अब नींद में डूब रहे हो, प्रत्येक क्षण में जागे रहने का प्रयास करो और तब तुम्हें प्रतीत होगा कि एक केन्द्र तुम्हारे भीतर निर्मित होने लगा, चीजें सघन होने लगी, एक केन्दीकरण होने लगा। अब प्रत्येक चीज़ केन्द्र से जुड़ने लगी।~यदि अचानक ऐसी परिस्थिति हो, कि कोई खतरा पैदा हो गया हो तो तुम्हें तुम्हारे भीतर केन्द्र की प्रतीति होगी क्योंकि खतरे के समय तुम सजग हो जाते हो।~नीत्से ने कहीं पर कहा है कि युद्ध चलते ही रहने चाहिए क्योंकि केवल युद्ध में ही कभी-कभी ‘स्वं’ की प्रतीति होती है इसीलिए खतरनाक खेलों के प्रति इतना आकर्षण है।~किसी भी क्षण जब भी तुम अपने प्रति जागे हुए हो तो तुम केन्द्र पर होते हो। परन्तु यदि वह स्थिति पर निर्भर है तो जब वह स्थिति चली जायेगी तो वह भी चला जायेगा। वह स्थितिजन्य नहीं होना चाहिए। वह आंतरिक ही हो। इसलिए सामान्य-से-सामान्य क्षण में भी सजग रहो।~~~जितना अधिक तुम अपने भीतर केन्दित हो जाते हो उतनी ही अधिक तुम्हारी उपस्थिति एक सुगंध बन जाती है। और जिनके पास भी ग्राहकता होती है, उन्हें उसकी प्रतीति होती है।
- जितने तुम मूर्छित होते हो, उतने ही तुम स्वयं से दूर होते हो। जितने अधिक चेतन, उतने ही स्वयं के निकट यदि सजगता संपूर्ण हो जाये तो तुम अपने केन्द्र पर होते हो। यदि यह चेतना थोड़ी-सी होती है, तो तुम परिधि के पास ही होते हो ।~ जब तुम मूर्छित होते हो, तो तुम परिधि पर ही होते हो जहाँ कि केन्द्र बिल्कुल विस्मृत हो जाता। इसलिए ये दो संभव मार्ग हैं। तुम परिधि पर आ सकते हो, तब तुम मूर्छित होते हो।~~~ कोई फिल्म देखते हुए, कहीं कोई संगीत सुनते हुए तुम अपने को भूल सकते हो। तब तुम परिधि पर हो। मुझे सुनते वक्त भी तुम स्वयं को भूल सकते हो तब फिर तुम परिधि पर हो। गीता , कुरान या बाइबिल पढ़ते समय भी तुम अपने को विस्मृत कर सकते हो। तब तुम परिधि पर हो।
- जीसस एक कहानी कहते हैं। एक बड़े घर का मालिक बाहर गया और उसने अपने घर के सारे नौकरों को लगातार सजग रहने के लिए कहा-क्योंकि किसी भी क्षण वह वापस लौट सकता है। यदि कोई तारीख तय हो, तो तुम सो सकते हो, तब तुम जो चाहो कर सकते हो, और तुम केवल उस निश्चित तारीख को ही सचेत रह सकते हो, क्योंकि तब मालिक आ रहा होगा। परन्तु मालिक ने कहा है, मैं किसी भी क्षण आ सकता हूँ। रात और दिन तुम्हें मेरा स्वागत करने के लिए जागते हुए रहना है।~ यही जीवन की कहानी है। किसी भी क्षण परमात्मा आ सकता है, किसी भी क्षण मालिक लौट सकता है। सतत सजग रहने की जरूरत है। कोई तिथि निश्चित नहीं है, कुछ भी पक्का पता नहीं है कि वह अचानक घटना कब घटित होगी। केवल इतना ही कोई कर सकता है कि सजग रहे और प्रतीक्षा करे। ~यदि हमसे कुछ भी उच्चतर की संभावना है तो फिर हम आराम से नहीं सो सकते। तब हमें सजग होना पड़ेगा। जगाना पडे़गा और संघर्ष व श्रम करना पड़ेगा। तब फिर रूपान्तरण हमारी चिंता का कारण बन जाता है।
- जो भी करें होशपूर्वक करें। यह एक लम्बी और कठिन यात्रा है। और एक क्षण के लिए भी होश रखना बड़ा कठिन है। मन सतत चलता ही रहता है। परन्तु यह असंभव नहीं है। यह अति कठिन है, बहुत श्रम चाहिए, परन्तु यह संभव है। प्रत्येक के लिए यह संभव है।~ केवल श्रम चाहिए समग्र रूपेण श्रम। प्रयत्न करते रहें। सफल न हों तब भी। शुरू-शुरू में ऐसा होगा। तुम बार-बार असफल हो जाओगे। ~तुम्हारी असफलताएं भी सहायक होंगी। वे तुम्हें बतलाएंगी कि तुम कितने मूर्छित हो। और यदि तुम इतना भी जान सको कि तुम मूर्छित हो तो भी तुमने थोड़ी सजगता तो पा ली। यदि कोई पागल इतना भी जान ले कि वह पागल है तो वह ठीक होने के मार्ग पर चल पड़ा।
-osho
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