मन का प्रयोग करके मन के पार जाना है…

इस विषय में दो परस्पर विरोधी दृष्टिकोण हैं—सांख्य और योग। दोनों का लक्ष्य एक ही है: मन के पार जाना। लेकिन इस लक्ष्य तक पहुँचने के उनके तरीके अलग-अलग हैं।

सांख्य का दृष्टिकोण:

सांख्य कहता है कि मन का उपयोग ही मत करो, क्योंकि अगर तुम मन का उपयोग करोगे तो मन और मजबूत होगा। मन को साधन बनाना ही गलती होगी, क्योंकि मन का उपयोग करने का अर्थ है उसे और सशक्त करना। इसलिए, सांख्य सीधा रास्ता सुझाता है—मन को पूरी तरह से समझो, उसकी गतिविधियों को देखो, और जब समझ पूरी हो जाएगी, तो छलांग अपने आप लग जाएगी।

यही दृष्टिकोण जिद्दू कृष्णमूर्ति जैसे दार्शनिकों का भी रहा है। वे कहते हैं कि कोई भी ध्यान विधि, कोई भी तकनीक तुम्हारी मुक्ति में सहायक नहीं हो सकती क्योंकि हर विधि का आधार मन ही होता है। और जब भी तुम कोई विधि अपनाते हो, तुम मन को ही मजबूत कर रहे होते हो। इसलिए, सांख्यवादी दृष्टिकोण में कोई ध्यान विधि, कोई प्रक्रिया, कोई साधना आवश्यक नहीं मानी जाती। केवल “देखना” और “समझना” पर्याप्त है।

योग का दृष्टिकोण:

योग का कहना है कि मन से बचने का कोई उपाय नहीं है, क्योंकि “समझ” भी तो मन के द्वारा ही आएगी। अगर तुम यह समझ पा रहे हो कि मन का उपयोग नहीं करना चाहिए, तो यह समझ भी मन के द्वारा ही आ रही है। इसका मतलब यह है कि मन को एकदम छोड़ देना संभव नहीं है, बल्कि हमें इसे सही तरीके से इस्तेमाल करना होगा।

मन को जंपिंग बोर्ड बनाना:

योग और तंत्र कहता है कि मन को जंपिंग बोर्ड की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जैसे तैराक पानी से ऊपर छलांग लगाने के लिए पानी पर ही जोर लगाता है, वैसे ही मन को आधार बनाकर तुम मन से परे जा सकते हो। 

-osho


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