होश की साधना….

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यह जागरण की साधना कहां से शुरू हो?

लोग आपसे कहेंगे कि भीतर झांके। मैं आपसे कहूंगा, जो बाहर झांकने में समर्थ नहीं है, वह भीतर कभी नहीं झांक सकेगा। इसलिए जागरण का पहला चरण है, बाहर जो जगत फैला हुआ है, उसके प्रति जागरण। वह जो हमारे चारों तरफ फैला हुआ जगत है, उसके प्रति जागरण पहला चरण है, वहीं से शुरुआत हो सकती है। जो बाहर के प्रति जागेगा वह धीरे-धीरे-धीरे भीतर के प्रति भी जागना शुरू हो जाता है। क्यों? क्योंकि बाहर और भीतर दो चीजें नहीं हैं, एक ही चीज के दो छोर हैं। जो बाहर के प्रति जागना शुरू होगा, वह धीरे-धीरे उसका जागरण, उसकी अवेयरनेस गहरी होगी और भीतर आता चला जाएगा। इसलिए जागरण के लिए पहला सूत्र है, जो हमारे चारों तरफ फैला हुआ जगत है, उसके प्रति जागना है।

अगर बाहर के जीवन का ठीक निरीक्षण हो, अगर बाहर के जीवन का ठीक-ठीक बोध हो, हम सब देखें, सुनें, जानें और मन के द्वार खुले रखें, और होश से भरे रहें, सोए हुए न हों; तो जिस मात्रा में हम बाहर के प्रति जागेंगे उसी मात्रा में हमारे भीतर जागरण की शक्ति बड़ी होती चली जाएगी। क्योंकि जागेगा कौन? जागूंगा मैं। जागूंगा बाहर के प्रति, लेकिन जागेगा कौन? जागूंगा मैं। मेरे भीतर बोध विकसित होगा, जागरण तेज होगा, गहरा होगा। और जितना मेरा जागरण गहरा होगा, उतना ही आप हैरान हो जाएंगे, जितना जागरण गहरा होगा, उतनी ही सूक्ष्म चीजों के प्रति जागा जा सकता है।

जब आप बाहर के प्रति जागेंगे, तो धीरे-धीरे आपको शरीर के प्रति जागरण अपने आप आना शुरू हो जाएगा। आप चलेंगे तो आपको पता चलेगा कि मैं चल रहा हूं। आपके हृदय की धड़कन भी आपको सुनाई पड़ने लगेगी। आपकी नाड़ी की गति भी आपको प्रतीत होने लगेगी। आपका शरीर भी आपको एहसास होने लगेगा। अभी एहसास नहीं होता आपको अपना शरीर। अभी तो एहसास शरीर का तभी होता है, जब कोई दर्द हो। सिर में तकलीफ होती है तो सिर का पता चलता है, अगर सिर में कोई तकलीफ न हो तो सिर का कोई पता ही नहीं चलता। अगर पैर में चोट लग जाए तो पैर का पता चलता है, अगर चोट न लगे, पैर का कोई पता नहीं चलता। शरीर का हमें कोई पता ही नहीं चलता कि शरीर है।

लेकिन जब आप बहुत गौर से जागेंगे, तो आपको शरीर का पता चलेगा। और जब शरीर का पता चलेगा तभी आपको यह भी पता चलेगा कि मैं और शरीर में कुछ फासला है, फर्क है। जब तक शरीर का पता नहीं चलेगा, तब तक फासला कैसे पता चलेगा? तब तक डिस्टेंस कैसे मालूम होगा कि मैं और शरीर में कुछ भेद है। मैं कुछ और हूं। और शरीर मैंने कपड़े की भांति ओढ़ा हुआ है, यह पता नहीं चल सकता। शरीर का धीरे-धीरे बोध होगा।

बुद्ध के पास उनका एक भिक्षु आनंद, वर्षों तक रहा। एक दिन सुबह उसने पूछा बुद्ध से कि मैं देखता हूं, रात आप सोते हैं, तो आप एक ही करवट सोते हैं, और जहां पैर रखते हैं, जिस पैर के ऊपर पैर रखते हैं, जहां हाथ रखते हैं, रात भर आपका हाथ वहीं रहता है, पैर वहीं रहता है, सुबह आप वैसे ही उठते हैं जैसा रात सोए थे; क्या रात भर आप जागे रहते हैं? बुद्ध ने कहाः जब से शरीर का बोध हुआ है, तब से शरीर वही करता है, जो मैं कराना चाहता हूं। अन्यथा शरीर कुछ भी नहीं करता। अगर मैं करवट बदलना चाहूं, तो ही बदलूंगा, नहीं तो नहीं बदलूंगा। शरीर का जब से बोध हुआ है, मैं शरीर का मालिक हो गया हूं। तो पैर जहां रखता हूं वहीं रखे रहता हूं, कोई जरूरत क्या है उसे बदलने की, जरूरत हो तो बदलूं। चूंकि वर्षों से कोई जरूरत नहीं पड़ी इसलिए उसे वहीं रखे रहता हूं।

यह हमें खयाल में भी नहीं आएगा। हमें तो जागे हुए भी अपने शरीर का कोई पता नहीं है कि वह क्या कर रहा है, तो सोए हुए शरीर का कैसे पता हो सकता है? लेकिन जिसको जागने में शरीर का पता हो जाएगा, उसे सोने में भी शरीर का अहसास होता रहता है कि शरीर है एक खोल की तरह और जब शरीर एक खोल की तरह अहसास होने लगता है, तब चेतना और जाग्रत होती है। शरीर पर अनुभव करके तब और जाग्रत होती है, और सूक्ष्म होती है और मन के विचारों को देखने में समर्थ हो जाती है।

भीतर जागरण बढ़ता है, उतनी सूक्ष्म चीजें दिखाई पड़नी शुरू हो जाती हैं। अनुभव में आनी शुरू हो जाती हैं।

-osho


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