जागने के लिए दो उपाय हो सकते हैं।
एक उपाय हठयोग का है। वह उपाय है कि रीढ़ में वह जो ऊर्जा है जीवन की, जिसको कुंडलिनी कहते हैं, उसे तुम ऊपर उठाओ।
दूसरा उपाय—कबीर, बुद्ध—उनका है। वह दूसरा उपाय यह है कि तुम जैसे—जैसे जागते जाओगे, वैसे—वैसे ऊर्जा ऊपर बढ़ने लगेगी। जैसे—जैसे तुम होश का उपयोग करोगे जीवन में, चलोगे तो होश से, बैठोगे, तो होशपूर्वक, उठोगे तो होशपूर्वक, बिस्तर पर सोने जाओगे तो होशपूर्वक, तब तक होश को सम्हालोगे जब तक शरीर नींद में डूब जाए, और धीरे—धीरे ऐसी घड़ी आएगी कि शरीर तो नींद में डूब जाएगा, होश सम्हला ही रहेगा। फिर नींद में भी होश चलने लगा।
इसलिए कृष्ण कहते हैं, योगी तब भी नहीं सोता जब सब सो जाते हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि वह बैठा ही हरता है, आंखें खोले ही हरता है। वह भी सोता है—लेकिन उसका शरीर ही सोता है। उसके भीतर का साक्षी—भाव जगा रहता है।
तो जैसे—जैसे साक्षी—भाव बढ़ेगा, वैसे—वैसे ऊर्जा ऊपर बढ़ेगी। अन्योन्याश्रित है। या तो ऊर्जा को ऊपर ले जाओ, तो साक्षी—भाव बढ़ेगा।
लेकिन ऊर्जा को ऊपर ले जाना अति दुरूह है और उपद्रव का मार्ग है। और लंबी साधना चाहिए, और शरीर का लंबा प्रशिक्षण चाहिए। और अति लंबी यात्रा है, एक जीवन में पूरी भी नहीं हो सकती क्योंकि वह बैलगाड़ी से यात्रा करने जैसा है। इसलिए धीरे—धीरे हठयोग प्रयोग के बाहर हो गया, उसकी जगह राजयोग ने ले ली। क्योंकि राजयोग चेतना पर सीधा काम करता है। और चेतना शीघ्रता से गतिमान होती है। क्योंकि कोई शरीर का साधना की जरूरत नहीं है। चेतना की साधना बड़ी सहज है। सिर्फ तुम्हें होश ही साधना है। अगर तुम हठयोग साधना चाहो तो शरीर सर्वांगरूप से स्वस्थ होना चाहिए, जो कि आज मुश्किल है। सर्वांग स्वस्थ शरीर खोजना मुश्किल है। क्योंकि सारी प्रकृति विकृत कर दी गई, और सारा प्राकृतिक जीवन अस्त—व्यस्त हो गया है। सब अप्राकृतिक है। हवा अप्राकृतिक है, जो तुम श्वास से लेते हो।
-osho
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