~ संकल्प की साधना से ही सधता है होश । एकत्रित होती है होश की ऊर्जा।
~ प्रत्येक संकल्प को पूर्ण करने से होता है क्रिस्टलाइजेशन और पैदा होती है आत्मा।
~ संकल्प की साधना में सबसे पहले छोटी-छोटी चीजों से संबंधित संकल्प लिए जाने चाहिए। उन संकल्पों के पूर्ण होने से इतनी अधिक होश की ऊर्जा एकत्रित होगी कि बड़ी से बड़ी वृत्तियों पर बिना प्रयास के विजय प्राप्त हो जाएगी।
~ दैनिक रूप से हठयोग का अभ्यास करना संकल्प की साधना का ही एक उदाहरण है।
~ शरीर के स्तर पर सजग रहने का संकल्प ही है सबसे बड़ा संकल्प ।
~ संकल्प की साधना दमन की साधना नहीं है बल्कि अपने होश को बढ़ाने की साधना है।
~वास्तविक ध्यान के फलित होने पर काम, क्रोध,लोभ ,मोह,भय, चिंता, अहंकार आदि आवेग वैसे ही खो जाते हैं, जैसे प्रकाश के आने पर अंधकार खो जाता है।
~ ध्यान की प्रत्येक विधि कुछ और नहीं करती , वह केवल आपकी विचार प्रक्रिया को मंद कर देती है।
~ जो संकल्प का मार्ग चुनते हैं, वे केवल एक ही पाप को जानते हैं और वह है, आध्यात्मिक निद्रा।
~ कोई भी क्षण न गंवाओ, संकल्प निर्धारित करके केंद्र पर ऊर्जा एकत्रित करो ।
~ यांत्रिकता को तोड़ने का एकमात्र उपाय होश की साधना से होश की ऊर्जा को बढ़ाना है।
संकल्प के बिना कोई साक्षी तक नहीं पहुंच सकता
संकल्प के बिना कोई साक्षी तक नहीं पहुंच सकता, हालांकि कोई चाहे तो संकल्प पर रुक जाए और साक्षी तक न पहुंचे।
जो आदमी संकल्प पर रुक जाएगा, वह आदमी शक्तिशाली तो बहुत हो जाएगा, लेकिन ज्ञानवान न हो पाएगा। इसलिए संकल्प के दुरुपयोग भी हो सकते हैं, क्योंकि वहां ज्ञान अनिवार्य नहीं है। शक्ति तो बहुत आ जाएगी, इसलिए उसके दुरुपयोग हो सकते हैं।
सारा ब्लैक मैजिक जो है, वह संकल्प की ही शक्ति से पैदा हुआ है। क्योंकि ज्ञान तो कुछ भी नहीं है, शक्ति बहुत आ गई है, अब उसका कुछ भी उपयोग हो सकता है। संकल्पवान व्यक्ति शक्ति से भर गया है। शक्ति का क्या उपयोग करेगा, यह कहना अभी मुश्किल है। वह बुरा उपयोग कर सकता है। शक्ति तटस्थ है। लेकिन शक्ति होनी तो चाहिए ही। बुरा करने के लिए भी होनी चाहिए, भला करने के लिए भी होनी चाहिए। और मेरा मानना है कि शक्तिहीन होने से चाहे बुरा भी करो, तो भी ठीक है। क्योँकि जो बुरा करता है, वह कभी अच्छा भी कर सकता है। लेकिन जो बुरा भी नहीं .कर सकता, वह तो अच्छा भी नहीं कर सकता।
इसलिए निर्वीर्य, शक्तिहीन होने से शक्तिवान होना बेहतर है। फिर शक्तिवान होने में भी शुभ और अशुभ की यात्राएं हैं। तो शक्तिवान होकर शुभ की यात्रा पर होना बेहतर है। लेकिन शक्ति की शुभ की यात्रा अगर ठीक से चले, तो साक्षी पर पहुंचा देगी। अगर अशुभ की यात्रा चले, तो साक्षी पर नही पहुंचोगे, संकल्प की शक्ति में ही भटक कर रह जाओगे। तो मेस्मरिज्म होगा, हिप्नोटिज्म होगा, तंत्र होगा, मंत्र होगा, जादू —टोना होगा। सब तरह की चीजें पैदा हो जाएंगी, लेकिन इससे कोई आत्मा की यात्रा नहीं होगी। यह भटकाव हो गया। शक्ति तो हुई, लेकिन भटक गई। अगर शक्ति शुभ की यात्रा पर चले, तो साक्षी का जन्म हो जाएगा। क्योंकि अंततः जब शक्ति पैदा होगी, तो आदमी शक्ति का इसलिए उपयोग करेगा कि स्वयं को जान सके और पा सके। यह उसकी शुभ यात्रा होगी। दूसरे को दबा सके और दूसरे को पा सके, यह अशुभ यात्रा होगी। शक्ति की अशुभ यात्रा का मेरा मतलब है ‘कि दूसरे को दबाऊं, दूसरे का मालिक हो जाऊं, दूसरे को कस लूं? तो अशुभ यात्रा शुरू हो गई। वह ब्लैक मैजिक है। शक्ति से अपने को पाऊं, पहचानूं, जीऊं, जान लूं कि कौन हूं, क्या हूं, यह शुभ यात्रा हो गई। अगर शक्ति शुभ यात्रा पर होगी, तो साक्षी बन जाएगी।
-Osho
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