सोहम् साधना का गूढ़ रहस्य

soham

जब श्वास ‘हम्’ ध्वनि के साथ अन्दर आता और लय हो जाता है ,तो एक क्षणांश होता है जो पूर्ण स्थिर और विचार-शून्य है। यह ‘मध्य-दशा’ है, श्वास-प्रश्वास के मध्य का स्थान। ध्यान में तुम्हें इसी स्थान पर केन्द्रित होना है। उस स्थान पर केन्द्रित होना, सर्वोच्च ध्यान और सर्वोच्च ज्ञान है। श्वास-प्रश्वास के मध्य वह स्थिर स्थान, वह निर्विचार स्थान ही मन्त्र का सच्चा लक्ष्य है। यह अद्भुत स्थान है। यह अहं विमर्श है, चिति का अन्तःस्फुरण। यही वह स्थान है जहाँ से सर्वशब्द उठते और लय होते हैं। यह वह निराकार स्थान है जो अपान को भीतर खींचता है तथा प्राण को बाहर फेंकता है। यह स्थान ईश्वर का, परमचिति का, आत्मा का स्थान है जहाँ ‘सः’ के उदित होने के पूर्व ‘हम्’ अन्दर लय हो जाता है; और बाहर जहाँ ‘सः’ लय हो जाता है, वह भी उतना ही ईश्वर का स्थान है। अतः इन दोनों वर्णों के लय का जो क्षण है, उसकी अनुभूति करो। यदि तुम उस क्षण को जान लेते हो, यदि तुम उसमें अवस्थित हो जाते हो तो तुम सत्य की अनुभूति कर लेते हो।
यह है हंसविद्या, हंस का विज्ञान। यह नैसर्गिक मन्त्र जप ही नहीं, नैसर्गिक प्राणायाम भी है।

योगशास्त्र प्राणायाम तथा कुम्भक के अनेक प्रकार बताते हैं; प्राणायाम यानी श्वास का नियमन और कुम्भक यानी श्वास का निलम्बन या उसे रोकना। योगीजन चित्त को शान्त करने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करते हैं। वे कुम्भक का अभ्यास इसलिए करते हैं, क्योंकि जब श्वास का निलम्बन होता है तो समाधि लग जाती है।
परन्तु शैवदर्शन कहता है कि प्राणायाम और कुम्भक परमात्मा की प्रेरणा से सहज रूप में होने चाहिए। वस्तुतः वे स्वतः हो ही रहे हैं। प्राणायाम कौन नहीं करता? श्वास, प्रश्वास और साँस का निलम्बन दिन-रात निरन्तर चल ही रहे हैं। यह सहज प्राणायाम है, सहज कुम्भक है। अतः तुम्हें प्राणायाम की किसी विशेष तकनीक के अभ्यास की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस यह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि श्वास के साथ क्या हो रहा है। तुम्हें कुछ करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। तुम्हें अपने श्वास को नियन्त्रित करने की आवश्यकता नहीं है। इसे बस स्वाभाविक रूप से आने-जाने दो। तुम्हें अपने श्वास को रोकने का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हें बस उस स्थान के प्रति सजग होना है जो श्वासों के मध्य पहले से ही है। इन दो वर्णों के अन्दर और बाहर लय हो जाने पर जो स्थिरता की स्थिति आती है, वह सहज कुम्भक है। हंस का अभ्यास करते-करते, श्वास के रुकने की अवधि स्वतः बढ़ने लगती है। कुम्भक की अवधि सहज ही बढ़ जाती है। जब तक श्वास रुका रहता है, तुम्हें आत्मानुभूति होती रहती है। यह समाधि की अवस्था है। इसी अवस्था से पूर्ण आनन्द का उदय होता है।
हंस मन्त्र के जप का उद्देश्य है, उस अवस्था को प्राप्त करना जहाँ श्वास लय हो जाता है। उसे सहजावस्था कहते हैं, वह अवस्था जब कुम्भक अपने आप होता है। यह सहज-स्वाभाविक योग है। यह सिद्धों का योग है और सर्वोत्तम है। यह कुशाग्रबुद्धि व्यक्ति के लिए ही है, क्योंकि अति सहज होने पर भी, महान समझयुक्त व्यक्ति ही इसे प्राप्त कर सकता है।
रंगनाथ महाराज नाम के एक महान सन्त हुए हैं। वे कहते हैं, “’उसमें’ लय हो जाने का कौशल हर कोई नहीं सीख सकता। यह अति सरल है, तथापि हर कोई नहीं जानता कि सहज-स्वाभाविक रूप से आत्मा में लीन कैसे हुआ जाए।” वे आगे कहते हैं, “भवबन्धन को काट देनेवाले इस कौशल को वही प्राप्त कर सकता है जिसे गुरुकृपा प्राप्त है।”
ऐसा नहीं है कि तुम्हें उस कुम्भक को घण्टे-दो-घण्टे के लिए पाना है। उसे एक क्षण के लिए भी पा लेना बहुत है। जब श्वास का लय हो जाता है, उस स्थिर क्षण की कीमत शास्त्रकारों ने आँकी है। वे कहते हैं कि दशलक्ष बार भगवान की महिमा गाना, मन्त्र के एक उच्चार के बराबर है, परन्तु दशलक्ष बार किया गया मन्त्र-जप, एक पल के लिए किए गए उस ध्यान के बराबर है जिसमें तुम स्थिरता के उस स्थान में लय हो जाते हो। वह परम निस्तब्ध स्थान है। उस स्थान में विचार नहीं, कल्पनाएँ नहीं, भावनाएँ नहीं। वह पूर्णतः रूप-गुण रहित है। उस अवस्था में न कोई दुःख है, न सुख, न नीरसता, न अज्ञान। वह परम सत्य की अवस्था है। वह तुरीय है, अतीन्द्रिय अवस्था। वह परमोच्च अवस्था है, उच्चतम योग है।

लय होने का वह क्षण, सहज कुम्भक का वह क्षण, वह क्षण जब ‘हम्’ चला जाता है और ‘सः’ अभी उदित नहीं हुआ है, वही सच्चा मन्त्र है : ‘हम्’ और ‘सः’, ये दो वर्ण भी नहीं, वरन् वह लय-स्थान ही सच्चा मन्त्र है।

-Swami Muktanand


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